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OUR POET's

  • vaidehivats109

आदर्शिनी

चन्द्र वलय के तीसरे परत पर

श्वासों की ध्वनियों से रचा था

श्रावणी मधुराग

अभीष्ट के स्पर्श से बरस पड़े थे नेत्र

मानो देह स्वयं में ही

खिलता-बिखरता मेघपुष्प हो ,,


किसी नवागंतुक के कल्पना मात्र से भी

भयभीत हो जाने वाला ये मन

एक अपरिचित हाथों से प्राप्त संदेश

भला कैसे स्वीकार कर लेता,,


डोली में बैठती हुई मीरा ने

निमग्न हो बंसी बजाते नागर से कहा था

समर्पण इष्ट के लिए होता है

और इष्ट हृदय तत्व हैं,,


अहिल्या की प्रतिमूर्ति बनकर

स्थिर रही मैं

वलय के लुप्त होते अन्तिम परत पर

जहाँ पर अभी भी अनुगूँज है हमारे मधुराग की

स्मृतियों की एक अन्तहीन श्रृंखला

लौटती है वहाँ से तुम्हारा गन्ध लिए हुए,,


शताब्दियों के वेदना का पराभव था

मोक्ष के स्पर्श मात्र के एक क्षण में ,,


कितनी अक्षुण्ण कितनी स्थिर थी मैं

प्रेम के आलिंगन में

उतना ही विस्फोटक रहा

तुम्हें जाते हुए देखना

मानो यही नियति थी

यही था प्रारब्ध

यातनाओं के शिविर में ठहरे इस प्राण का,,


किन्तु भिक्षुणी नहीं , मानिनी हूँ मैं

करुणा एवं समर्पण के प्रभेद को

समझ कर भी झुठलाती हुई

लुप्त प्रेम को अक्षुण्ण बना

प्रतीक्षा को चिरायु बनाती हुई,,


©® सौम्या सिंह "वैदेही"


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कल्पनाओं का अवसान

दर्शनों पर शोध करने वाला ये मन शब्दों में नहीं बांध सका कभी निकट आते तुम्हारे देह-गन्ध और स्पर्श की शीतल अनुभूति को,, गङ्गा जल को छूकर भी नहीं बता सकती तुम्हारे शब्दों की आद्रता न ही इंद्रधनुष में कोई

प्रतिबिम्ब

प्रेम की प्रथम अनुभूति हो तुम तुम्हारी प्रतीक्षा भी इतनी मधुर मानो चरणामृत हो स्वयं प्रेम का,, चिर दर्शनाभिलाषी मन क्षण-क्षण इतना उच्चारित करता रहा तुम्हारा नाम कि अब प्रेम शब्द के स्थान पर अंकित_ हो

पृथक्त्व

ये पृथक्त्व भी हेमन्त में ही आना था कहाँ समझ पाया मन तर्पण का भात रांधते समय चित्त पितरों पर होना चाहिए हिय के पीड़ पर नहीं किन्तु मन था कि टभकता था चूल्हे पर रखे भात की ही तरह,, जो मन व्याकुल रहा पितर

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