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OUR POET's

  • vaidehivats109

उपमाओं का छल


प्रतीक्षा एवं मौन की

एक लम्बी नदी के साथ-साथ

बहते हुए आभास हुआ

त्याग समर्पण आदि सैद्धांतिक भाव

मन को छलने के साधन मात्र हैं,,


अश्रुओं एवं पीड़ाओं पर

चढ़ाया हुआ स्वर्णिम कलेवर का

सर्वसिद्ध नाम है समर्पण

अप्राप्य प्रेम को

अपनी थाती बनाते हुए

कह देते हैं हम त्याग

किन्तु भरते जाता है

भीतर पीड़ाओं का गाद,,


प्रतीक्षा का लवण छीन लेता है

हमारी जिह्वा से हरेक स्वाद

शहद को भी हमारी स्वाद ग्रन्थियाँ

कह उठती हैं क्षार-क्षार

कदाचित हम भूलने लगते हैं

हममें ही थी प्रेम की अद्भुत मिठास,,


जिस तरह मुख्य विग्रह कि अनुपस्थिति

धीरे-धीरे कर जाती है

समस्त देवालय को देवहीन

और मन

विरक्ति से भरता चला जाता है,,


ठीक उसी तरह

जब मन टटोलता है भविष्य को

जहाँ तुम्हारे न होने से

होता है अस्तित्वहीनता का भय

स्वतः ही उदित करता है विराग

आखिर इस नदी के

रेत में मिल जाने पर

कौन कहेगा "मेरी मोक्षदा",,


क्या अपने निर्वाण की सूचना

देनी होगी मुझे ही ??

या कि एक नए कलेवर में सजाकर

तुम्हारे समक्ष रखूंगी अपनी पीड़ाएँ ??

या कि प्रेम के चोट को आनन्द बताते हुये

सिद्धहस्त हो जाऊँगी स्वयं को छलने में ??

©®सौम्या सिंह "वैदेही"

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