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  • vaidehivats109

और चाँद पिघलता रहा...

और चाँद पिघलता रहा ...

मध्य रात्रि के उपरान्त भी वो खिड़की से अलकनंदा को बहते देखती रही

जो अपने धुन में मचलती कोई गीत गुनगुनाती

तन्मयता से बहती जा रही थी

अँधेरा गहरा होने पर भी


प्रवाह की अनुभूति पूर्णतया जीवंत थी

बिल्कुल मुखरित प्रेम की तरह अल्हड़ता से भरपूर

इसे अनसुना करना फलित शाप की तरह था


कभी - कभी लगता है कि ये प्रतीक्षा

जब पहुँचेगी ब्रम्हमहूर्त के प्रथम बेला तक

कहीं कोई नई नदी न फूट पड़े पथराई आँखों से

कहीं ये निगल न जाए प्रेम के वजूद को एक ही निवाले में


मञ्जूषा में रखे पत्रों को एक बार पुनः पढ़ती हैं आँखें

और चाँद मेघ बन पिघलना शुरू हो जाता है

किसी अन्य की प्रतीक्षा का निष्फल समाप्त हो जाना

अपनी प्रतीक्षा को सचेत और सशंकित कर जाता है


पिघलते चाँद के क्रंदन को देख मेरा हृदय अब

धीरे-धीरे प्रेम के प्रति एक मलिनता से भरता जा रहा है

जब भी मैं लिखना चाहती हूँ प्रेम

उसमें छल की आशंकाएं प्रकट होने लगती हैं


फिर भी मन कहता है

प्रतीक्षा ही तो प्रेम है , प्रेम ही तो प्रतीक्षा है

और पीड़ाओं की झिलमिलाती श्रृंखलाएं प्रेम का सोलह श्रृंगार

देह से परे जो कुछ है वो प्रेम ही तो है

जो गिनता रहता है हृदय के स्पन्दन को बारम्बार ....

वैदेही वत्स ✍️

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