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OUR POET's

  • vaidehivats109

कल्पनाओं का अवसान


दर्शनों पर शोध करने वाला ये मन

शब्दों में नहीं बांध सका कभी

निकट आते तुम्हारे देह-गन्ध और स्पर्श की शीतल अनुभूति को,,


गङ्गा जल को छूकर भी नहीं बता सकती तुम्हारे शब्दों की आद्रता

न ही इंद्रधनुष में कोई रङ्ग है कि उतार दूँ तुम्हारे मृदु हास को किसी भोजपत्र पर,,


बस इतना समझ लो कि हृदय मुक्त है पूर्णतः

पीड़ाओं के श्वेताग्नि से

और देह हल्का है कास के फूल सा,,


अब यदि अवसान भी हो जाये कल्पनाओं का तो

हृदय साध लेगा प्रणय राग श्वासों के मद्धम ताल पर

गुनगुनायेगा प्रेमगीत कतकी ओस में भीग कर,,


हेमंत के अलसाये मयूख की नरमाई को छू भरमायेगा ये देह,

किसी छुवन की सलज्ज अनुभूति के चीवर से बनाएगा आत्म अवगुंठन,,


सारस के जोड़ों सी पंख फैलाएगी

अभी ये शिशिर की धूप

रोपी जाएंगी स्वप्नों की सौ क्यारियाँ,

इन्हीं दो जोड़ी आँखों में खिलेंगी हास की फुलवारियाँ

होंठो से पारिजात झड़ेंगे , ग्रीवा पर मादक मोतियाँ,,


अभी बाकी है पूस का आगमन

लम्बी तमिस्री रातों से भय नहीं

न ही कांपते हृदय की मुझे चिंता

अभी तो जाएंगी अनेक इच्छाएँ शीतनिद्रा के आलिंगन में

अभी होगी मोतियों की खेती आँखों के ऑंगन में,,


अभी खुलेंगे भेद विरह राग के मार्मिकता की

कई गांठ गलेंगी एक स्पर्श मात्र की प्रतीक्षा में,

मिले उत्तर

तो बताना मुझे तुम स्मृतियों से मिले सुख की आयु

कितनी लम्बी थी ??

कल्पनाओं के सावन में काया कचनारी हुई क्या ??,,,

©®वैदेही वत्स

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