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OUR POET's

  • vaidehivats109

||•तदन्तर•||


प्रेम की टहनियों से

झर चुके थे पारिजात

और वहाँ उग आईं पीड़ाएँ

अपेक्षा और उपेक्षा के

दंश को लिए हुए

रिक्तियां जानती थी कि

उन्हें छुपाया जा सकता है

आडम्बरों के ठीक नीचे

नींव में पड़े कलश की तरह

प्रेम कविताओं की पाण्डुलिपियों पर

जमती धूल और सूखती कलम ने

छुपा लिया स्मृतियों को

न जाने कब अपने आँचल में

महावर के लाल रङ्ग ने

प्रीत के पीत की चुनरी पर

अपने पैरों के चिह्न छोड़ते हुए

धीमे से कहा ,,

हो रहे हम विदा

धधकते रहे अनेक स्वप्न

आँखों के अलाव में

महीनों तक

वर्षों तक

पूरी तमन्यता से

जैसे जलती हैं चिताएं

आसमान को छूने की ललक में

निःशब्दता की एक महीन नदी

बह निकली हमारे बीच

जिसमें कभी हम डूबे

कभी तिर गए

कभी बैठे रहे

उसी किनारे रात-रात भर

कहते हैं

जब टूटती हैं निःशब्दता

तो साथ टूट जाती हैं अनेक वर्जनाएं

टूटते हैं पलकों के बांध

खुल जाती हैं मन की गलियां

और फिर उग आता है

भोर का उजास लिए

चौथे प्रहर शुक्रतारा

इस विश्वास के साथ

कि पिघलेगा मौन का हिम

खिलखिला उठेंगी फिर नदियां ...!!

वैदेही वत्स✍️

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