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OUR POET's

  • vaidehivats109

||दीप्तता का श्राप||


उजास के निरन्तरता से दग्ध हुए नेत्र

विश्राम पाने की चेष्टा में

हथेलियों से ओट माँगती

प्रतीक्षित रही सदियों से,,


किन्तु कोई छवि न उभरी

जिसके पीठ की छाया में

हो सकूँ मुक्त

अविरल दीप्तता के दाह से

चिरकालिक अनिद्रा के श्राप से,,


अंततः

बन्द कर हृदयपट ,

ओढ़ एकान्त का मुखावरण

मूंद ली दृगों को ,

और दी स्पंदनों को शपत

अब न बुने राग कोई ,

अब न करे नाम जप,,


आँचर से पोछ

प्रेम की सम्पूर्ण पाण्डुलिपियाँ

अनुभूतियों को बहा दी

अश्रुधार में

कर विखण्डन स्मृतियों का

रोप आई मरु धार में

और सींचती रही

औदास्य के उष्ण बूंदों से,,


तभी हथेलियों को छूने लगी

कोंपलों की

अदृश्य अपरिमित सघनता

स्मृतियों की प्रतिच्छाया

उतरने लगी आँखों तक

और शीतल होती चली गई

उजास की दग्धता,,


इस सघनता की छाया में

छुपी थी

तुम्हारे प्रेम की स्निग्धता

और अँजुरी से

प्रवाहित हो रहा था

मादक पीड़ाओं का रसधार......


वैदेही वत्स✍️

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