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OUR POET's

  • vaidehivats109

•••द्युति


एक दूसरे में निमग्न हम भूल गए कि

परस्पर पकड़े दो हाथों के बीच

मिलने वाली हस्तरेखाएँ बनने लगती हैं

स्वेद की नदियाँ

और पकड़ स्वतः ही ढीली होने लगती है ....

प्रगाढ़ता ऐसी मानो प्रेम का पंचगव्य

मिलकर बन गया हो चरणामृत

जिसे विभक्त करना स्वयं ब्रह्मा की अवहेलना थी ...

तुम्हारी निकटता के अलभ्य आचमनी ने

मुझे सिर्फ प्रेम गढ़ना सिखाया था ....

दूरी की कल्पना से पूर्णतः अनभिज्ञ मैं

उपालम्भ की स्थान पर लिखती रही प्रेम ही

पुष्पसार के विलुप्त होने पर भी .....

मेरा प्रेम आज भी प्रतीक्षारत है

और स्मृतियाँ माँगती हैं अपने अस्थिकलश का तर्पण

प्रेम और स्मृति के मध्य तुम्हें आवाह्न करती मैं

बन चुकी हूँ द्युति प्रेम के यज्ञवेदी की ....!!

©® वैदेही वत्स

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