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OUR POET's

  • vaidehivats109

पाषाणी

दुष्कर है; अति ही दुष्कर

"विस्मृत किये का" विस्मरण

रोकना उस पुकार को जो

घुला हुआ है जिह्वा पर

बसा हुआ है कण्ठ में,,


ढूंढता है मन , स्वयं को बहटारने के

कितने ही साधन ;

तुम्हारी कल्पनाओं के अवरोधन से पूर्व

इसका अनुमान भी दुर्वह है

मन जो बहता था तुम्हारी ओर

अंततः अभेद्य पाषाण हो जायेगा,,


पूर्वोन्मुखी अर्कहिता को देख

जब-जब मैंने देखा तुम्हारी ओर

दिखा तुम्हारा अपने ही धुन में

निर्बाध चलते चला जाना

सच ही तो है मृगांग कब ठहरा है

नदी में बनते

अपने बिम्ब को देखने के लिये,,


किन्तु नियती की ये कैसी निःशब्द चोट

याकि ब्रह्मा की लेखनी ने प्रारब्ध लिख दिया

बहती रही अविरल सदानीरा

आँखों के कोर से

और मन प्रतीक्षा में रेगिस्तान हो गया,,


कदाचित इसलिए ही प्रेम ने

भर दिए

पीड़ाओं में मादकता

प्रतीक्षा में मधुरता,,


औदास्य में

स्मृतियों का मृदुहास

और दुखों के सघन वन में

उर्मियों सी आस,,

©®सौम्या सिंह "वैदेही"

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