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OUR POET's

  • vaidehivats109

||•पुनरागमन•||

तुम

मन के निर्मम ताप के दहन से उद्विग्न

स्वप्न के धरा पर उगने को विकल

नेत्रों से अनवरत छलकते

शीतलता के ध्रुवीय कण हो ,,,


प्रतीक्षा वह है

जो आतुर है और धीर भी है

जला भी रहा और गला भी रहा

इसी जलने और गलने के मध्य

अटकी हुई मैं देख रही हूँ बाट,,


चिरप्रतीक्षित मैं

अब चुनती हूँ स्मृतियों के पुष्प

महुए की तरह

रिक्तता तुम्हारी भरती है मन को

स्वयं के प्रति मृदुता से,,

फिर भी भयभीत हूँ

हठास ही जो तुम आ गए तो

प्रतीक्षा के प्रेम में रत मेरा हृदय

कहीं विरक्त तो नहीं हो जाएगा

तुम्हारे स्पर्शगन्ध से ??


©® वैदेही वत्स

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कल्पनाओं का अवसान

दर्शनों पर शोध करने वाला ये मन शब्दों में नहीं बांध सका कभी निकट आते तुम्हारे देह-गन्ध और स्पर्श की शीतल अनुभूति को,, गङ्गा जल को छूकर भी नहीं बता सकती तुम्हारे शब्दों की आद्रता न ही इंद्रधनुष में कोई

प्रतिबिम्ब

प्रेम की प्रथम अनुभूति हो तुम तुम्हारी प्रतीक्षा भी इतनी मधुर मानो चरणामृत हो स्वयं प्रेम का,, चिर दर्शनाभिलाषी मन क्षण-क्षण इतना उच्चारित करता रहा तुम्हारा नाम कि अब प्रेम शब्द के स्थान पर अंकित_ हो

पृथक्त्व

ये पृथक्त्व भी हेमन्त में ही आना था कहाँ समझ पाया मन तर्पण का भात रांधते समय चित्त पितरों पर होना चाहिए हिय के पीड़ पर नहीं किन्तु मन था कि टभकता था चूल्हे पर रखे भात की ही तरह,, जो मन व्याकुल रहा पितर

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