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OUR POET's

  • vaidehivats109

पृथक्त्व

ये पृथक्त्व भी हेमन्त में ही आना था

कहाँ समझ पाया मन तर्पण का भात रांधते समय

चित्त पितरों पर होना चाहिए

हिय के पीड़ पर नहीं

किन्तु मन था कि

टभकता था चूल्हे पर रखे भात की ही तरह,,

जो मन व्याकुल रहा पितरों का तर्पण करते हुए

वह उन्हें सर्वस्व अर्पण भला कैसे कर पाता,,

तभी कोई ध्वनि इतनी जानी पहचानी लगी

कि लगा किसी ने पुकारा है मेरा ही नाम

किन्तु इतनी भाग्यशाली तो नहीं मैं

कि अधीरता के नौका पर धैर्य की पोटली थामे

सुगमता से लाँघ जाऊँ विरह के इस महानद को,,

कहते हैं देव विग्रह के स्थापना मात्र से

पवित्र हो जाती है श्मशान भूमि भी

मेरे नाभि में स्थापित है

जन्म-जन्मांतर के लिए तुम्हारे नाम का सन्ताप

बिना मांगे ही दे दिए तुमने

व्यथा ,वेदना , अश्रु ,पीड़ा और पश्चाताप ,,

अब बस देना मुझे प्रतीक्षा का प्रसाद

जैसे पीतर देने आते हैं उत्तराधिकारियों को आयुषता का वरदान

जैसे स्मृतियाँ उतरती हैं हृदय में हरने को हर विषाद,,


©®वैदेही वत्स

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