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OUR POET's

  • vaidehivats109

प्रतिबिम्ब

प्रेम की प्रथम अनुभूति हो तुम

तुम्हारी प्रतीक्षा भी इतनी मधुर

मानो चरणामृत हो स्वयं प्रेम का,,


चिर दर्शनाभिलाषी मन

क्षण-क्षण इतना उच्चारित करता रहा तुम्हारा नाम

कि अब प्रेम शब्द के स्थान पर

अंकित_ हो गया है तुम्हारा नाम,,


तुम्हारी अनुपस्थिति को नकारता मन

अस्वीकृत कर दिया आगत_ बसंत को

जो लेकर आया था पलाशी रङ्ग से रङ्गा हुआ गुलाल,,


वारिजदल पर ओस इकट्ठा कर

पिलाती रही मैं चकोर को

किन्तु मेरी ग्रीवा_ सूखी ही रही

तब से अब तक,,


मेरे हृदय के एकांत अनुर्वर भूमि पर

उगने लगे हैं पीड़ा के नन्हें-नन्हें कोपल_

जो मेरे आँखों में प्रतीक्षा के साथ घोल देंगे

खारा सा स्याह लवण,,


हृदय का एक भाग अब भी

लीन है चिर प्रतीक्षा में

दूसरा कह रहा _हो पुनः दर्शन और खुल जाए मोक्षद्वार,,


सुनो न !!

या की कर दो मेरी प्रतीक्षा का अन्त

या की एक बार मिलकर खोल दो तुम मोक्षद्वार

निर्वाण तो तुम्हारे हाथों ही तय है,,


मेरी कविताएं तुम्हारे विछोह का प्रतिबिम्ब है

तुम मेरा प्रेम समझ क्यों नहीं जाते ¿¿.......

वैदेही वत्स ✍️

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