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OUR POET's

  • vaidehivats109

प्राण प्रतिष्ठा

तुम्हारे प्रेम के माधुर्य में आकण्ठ डूबा मन

अपरिचित था विछोह की परिकल्पना से भी

शुक्रतारा के टूटने पर आभास हुआ

प्रेम में पीड़ा का समायोजन

अनिवार्य है !


प्रतीक्षा इतनी मधुर थी कि

उनके आगमन के स्वप्न मात्र से

मौलश्री सिहर-सी जाती थी

सकुचाई सी छुईमुई भी

सीख रही थी समर्पण पारिजात से !


स्वाति नक्षत्र का प्रतीक्षित चकोर

पूरे छब्बीस नक्षत्रों से करता रहा मनुहार

किन्तु क्षण प्रतिक्षण सशंकित मन

वंचित रह गया आद्रा के दो बूंद से !


मध्य रात्रि की भयावह नीरवता

शिउली के सङ्गीत से गुंजयमान हो उठा

प्रतीक्षा स्वस्फूर्त हो थिरकने लगी पुतलियों में

इतनी मादकता थी विछोह के पीड़ा में !


प्राण प्रतिष्ठा के क्षण जैसे जैसे निकट आते गये

भग्नावशेष का गह्वर अन्तस् प्रकाश से

आलोकित होकर पुनः गढ़ने लगा शुक्रतारा में प्रेम

और मेरे हृदय के स्पन्दन को

विग्रह के हृदय में स्थानांतरित करता चला गया !


वैदेही वत्स ✍️

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