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OUR POET's

  • vaidehivats109

प्रेम है अम्बक भर

प्रेम तो प्रेम होता है

हार-जीत की परिकल्पना

मुझे कभी समझ नहीं आई

प्रेम या तो है या हुआ ही नहीं ..


समर्पण हमेशा पूर्ण होता है

अपूर्ण समर्पण की

अवधारणा ही मिथ्या है

क्योंकि किया हुआ समर्पण

कभी वापस नहीं लिया जा सकता ...


प्रेम में अलगाव

बस मन का भेद है

क्योंकि अलगाव शरीर का सम्भव है

हृदय के भीतर बसे प्रेम का नहीं ...


प्रतिक्षा कभी निःस्वार्थ नहीं होता

ये कम या अधिक हो सकती है क्योंकि

प्राप्ति की इच्छा ही प्रतिक्षा है...


वेदनाएं कभी अकेली नहीं आती

साथ लाती हैं अश्रुओं का बाढ़

जो डुबाती है हृदय को

और

तार देती हैं प्रेम का भाग्य....


अन्धकार बड़ा दुर्बल होता है

टूट जाता है इसका अहंकार

एक जुगनू के चोट से

सुनो उजाला विद्रोह नहीं

प्रेम है अम्बक भर....

©® सौम्या सिंह वैदेही

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