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OUR POET's

  • vaidehivats109

मधुराग

नेह मद से मुदित मन

जय-पराजय छोड़ पीछे

कर समर्पण प्रियअङ्क में

प्रेम के आँगन में उन्मुक्त डोलता है,,,


स्पर्श के झंझवात से झंकृत

बेसुध सा बावला मन

अंजुरी में लेकर प्रियमुख

मेघ बन बरसता है, सिहरता है,,


अनकही की कामना से

रिसती मूँदती आँखें,

कुछ अस्फुट सी

जो अवरुद्ध है कण्ठ में

रुलाती है हँसाती है,,


मन के देह पर उगती

अमियपुष्प की मञ्जरियाँ

लिखकर कोई महाकाव्य

धो देती हैं अश्रुओं के बौछार से,,


मधुराग के पावस में भीग

विरहन कोयली भी कूकती है

कृष्ण के बांसुरी सी.....

©®वैदेही वत्स

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दर्शनों पर शोध करने वाला ये मन शब्दों में नहीं बांध सका कभी निकट आते तुम्हारे देह-गन्ध और स्पर्श की शीतल अनुभूति को,, गङ्गा जल को छूकर भी नहीं बता सकती तुम्हारे शब्दों की आद्रता न ही इंद्रधनुष में कोई

प्रतिबिम्ब

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पृथक्त्व

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