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OUR POET's

  • vaidehivats109

मूक पीड़ाओं का अंतर्द्वंद्व

अपनी समग्र विवशताओं को परे रख

मैं सम्मुख हुई पुनः प्रेम के

विरह के चुभन को पीछे छोड़

चुन लाई थी अँजुरी में मौन के श्वेत पुष्प,,


प्रेम और विश्वास के अतिरिक्त

अब मौन ही मेरे पास शेष था

जिसे मैं अर्पित कर सकती थी,,


मूकता में

सब रंग एक समान हो जाते हैं

उसमें श्वेत क्या , श्याम क्या

फिर भी मैं ले आई थी ओस से भीगे श्वेत पुष्प,,


भूमि पर गिरे हरसिंगार को चुनकर

मैं सीधे नहीं रख पाई कभी पूजा की थाली में

उसकी नमी अनुभव की हमेशा अपने आँचल में

क्योंकि अश्रु समेत हरसिंगार का अर्पण

अपमान होता है मूक पीड़ाओं का,,


यदि अब भी वो नहीं समझ पाये

मौन में छुपे अनुग्रह , भय,

कातरता और असुरक्षा को

तो कौन है जो मेरे हृदय में व्याप्त

मरुस्थल को नम करने का सामर्थ्य रखता है,,


क्या गह्वर में दीप जलाए बिना

इष्ट दूर करेंगे अपने विग्रह पार्श्व के अन्धकार को ??

क्या जब हम पुनः सम्मुख होंगे

निकटता इतनी होगी कि पढ़ ले वो बिना शब्दों के

मेरे आँखों के मौन को , प्रेम के अनुग्रह को ¿¿¿¿....

©® सौम्या सिंह वैदेही

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