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OUR POET's

  • Writer's pictureAjay Vatsyayan

*मैं मिलूंगा उनसे*

Updated: Jun 5, 2023

मैं मिलूंगा उनसे,

त्रसरेणु के अल्प-क्षणों में ज्योतिर्लिंग की दृढ़ता लिए, उतार लाऊंगा हिमनग उनके नथिए के लिए, और चखूंगा शिवत्व जिसे उन्होंने भर रखा है अंजुरियों में रिसते हुए; रेतस कुंड से",,


वो जब हँसती है बसंत की तितलियों की तरह ,,

और इठलाती है श्रावणी आम्र पल्लव की कौमार्यता पर, बस जाती हैं विप्र के हृदय में नागरीय सभ्यता की तरह,,


हर साँझ दिशाएं उतर आती हैं उनके बिछुए में, और बिहान से पहले "दसों दिशाएं लौट जाती है अपने अंतिम छोर पर, देखता हूँ मैं उनके कर्णफूल के ओट से:

" उषा को संभालते हुए आँचल, सुलझाते हुई भीगे बालों को" ,,


डूब कर उन संगम के क्षणों में,

बुद्धत्व को आरूढ़ करूंगा मैं, उनके मेरूदंड पर, और पूछुंगा "हस्तामलकवत" उन "दिक्-गुप्तचरों" से,,


"आखिर कैसे वो एकाधिकार रखती है दसों दिशाओं पर",,


मैं चाहता हूँ चूमना "उनके ललाट पर टंके ऊर्धरेतस की चंद्र बिंदुता को- जिसे छिपाया है उन्होंने अपनी बिंदी से", जो है "दिग्पालों" की स्थली,,


जो रक्षक हैं उनकी लावण्यता की, जहाँ तक पहुँच मैं करना चाहता हूँ अपने ओजस का संयोजन उनके रेतस से,

"ताकि जान सकूँ, घनत्वहीन प्रेम के विलयन की सांद्रता",,

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