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OUR POET's

  • Writer's pictureVaidehi Vats

|| रिक्तियां ||



तुम्हारी अनुपस्थिति में भी

तुम्हारे होने की सुगन्ध

करती है सराबोर मन के आँगन को

तुम्हारी प्रतीक्षा उसी सुगन्ध की

अनवरत चाहना का मौन पुकार है,,


पलटते हुए पुराने पत्रों के पन्नें

रुक जाती हैं आँखें

किसी धूमिल शब्द पर

उंगलियाँ चखती है नमक

अश्रु के दाग की

स्मृतियाँ पोंछ कर धूल

खोल देती हैं पुरानी झिरियाँ,,


अह,, चाँद भी चुभ रहा है आज

रात्रि के देह पर

अनुपस्थिति तुम्हारी बजाती है सांकल

एकांत के अन्धकार पर

रिक्तियां भर रही हैं

विकलता के फफोलों में पानी

एक शून्यता उभर रही है

तृषा के भीत पर,,


मुखर कर जाती है

तुम्हारी अनुपस्थिति

स्पर्श की अनुभूतियों को

मौन के पुकार को

दूरियों की वेदना

और विछोह के अन्तराल को

उपस्थिति की स्मृतियाँ

और

अनुपस्थिति के प्रहार को .....


©®वैदेही वत्स

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