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OUR POET's

  • vaidehivats109

लप्रेक


मोक्ष - फिर तुम्हारी आँखें नम है वैदेही ... कुछ हुआ क्या ??


-तुम जानती हो न ..तुम्हारी उदासी सिर्फ तुम्हारी नहीं है ..


- उदास हो जाते हैं तुम्हारे नुपूर से रोशनी पाते समस्त जुगनू ..


-मौन हो जाते हैं

नवों नवग्रह सत्ताइसों नक्षत्र और भोर का शुक्रतारा भी...


कहो न ~ क्या हुआ ¿¿¿


-आज देखा है मैंने विरह में डूबे तीसरे प्रहर की रात को...


- बादलों में बन्दी बने पूनम के चाँद को...


- धरा के अश्रु को पीकर ..शीतल जल बरसाते हुए मेघ को...


-होते ही उजास फिर लुप्त होगा चन्द्रबिम्ब भी ,, देखो न.. घबराई सी मोक्षदा उसे बांध रही आँचल में


-छू गया मुझे


शिउली का निःशब्द झड़ना , मोगरे की कलियों का तोड़े जाने से डरना...


-हाँ .. भीग गई मैं


रात्रि की पीड़ाओं का ओस बन बरसने से ,काँच बन दरकने से , चातक को चाँद देख तड़पने से ...


-डूब गई मैं


अवरुद्ध कण्ठ की हिचकियों में , हवाओं में गूँजते सिसकियों में ...


-बिखर रही मैं


नीलम सी रोती रात देख .. कञ्चन को बनते राख देख ...


मोक्ष -लेकिन ....


देखा हूँ अक्सर,,रात्रि के इसी तीसरे प्रहर चम्पा को मुस्काते हुए , प्रेमियों को मल्हार गाते हुए..


-जिया हूँ इस क्षण को , तुम संग स्वप्न बुनते हुए , प्रेम परिपथ चुनते हुए,,


-हाँ गुणा है मैंने


इसी तीसरे प्रहर में , तुम्हारे विदेही उजास को, सिमटते दायरे से फैलते प्रकाश को ...


-और इसी सिकुड़ते दायरे से आती उजास, रोशनी देगी हमारे प्रेम की निजी दुनिया को,,


हमारी इस नई दुनिया की अक्ष हो तुम ...

- इस क्षणभंगुर दुनिया में प्रेम ही तो जीवन है ... और मेरा प्रेम तुम हो ....!!!☺️


वैदेही वत्स ✍️

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