top of page

OUR POET's

  • vaidehivats109

विखण्डन

जिस अदृश्य की मूर्तियां बनाते हुए

लुप्त हुई थी मेरी कविताओं की श्रृंखला

उसी दृश्यता को सस्वर उच्चारते हुए

अनायास ही पुकार बैठे मुझे तुम

रक्त प्लवन से प्रकम्पित हो उठी हृदय की

समस्त धमनियां ,जो अब तक निस्पंद थी,,

ये प्लवन था भी तो प्रमादी लय में

थिरकता रहा मन भीतर ही भीतर

ढह गई वेदनाओं की ऊँची अट्टालिकायें

कदाचित शालिग्राम के अन्तस्थ में ब्रह्मा ने

खीचीं थी हमारी प्रेम रेखाएँ

कृष्ण के "अकर्षिणी" बाँसुरी से,,


व्रणों की चीवर से लिपटी-ढकी मैं

लिखती ही जा रही थी वेदनाओं की गाथा

मानो प्रेम "आनन्दिनी" की सुर साधना नहीं

संकीर्ण दलदलिय घाट हो गोदावरी तट का

सन्निकट तुम भी तो नहीं थे

कि बाँध लेते मुझे भुजा युग्म के पाश में,,


सन्ताप के लावा को हृदय में समेटती मैं

भला कैसे कर पाती नवस्वप्नों का सृजन, पालन और किण्वन

यहाँ तो कल्पों की शुचिशैया थी और कण्ठ में रुका था शुचिखण्ड

भला कैसे पारण हो प्रेम के

चिरकालीन उपवास का,,


रिक्तियों के महासागर ने ,न जाने

कितने भ्रम ,कितनी मूक पीड़ाओं का सृजन किया

तुम्हारे पास शब्द थे ध्वनि थी और थीं असंख्य लिपियां

और मेरे पास थी विखण्डित कविताओं की एक श्रृंखला मात्र,,,


©®

वैदेही वत्स

3 views

Recent Posts

See All

कल्पनाओं का अवसान

दर्शनों पर शोध करने वाला ये मन शब्दों में नहीं बांध सका कभी निकट आते तुम्हारे देह-गन्ध और स्पर्श की शीतल अनुभूति को,, गङ्गा जल को छूकर भी नहीं बता सकती तुम्हारे शब्दों की आद्रता न ही इंद्रधनुष में कोई

प्रतिबिम्ब

प्रेम की प्रथम अनुभूति हो तुम तुम्हारी प्रतीक्षा भी इतनी मधुर मानो चरणामृत हो स्वयं प्रेम का,, चिर दर्शनाभिलाषी मन क्षण-क्षण इतना उच्चारित करता रहा तुम्हारा नाम कि अब प्रेम शब्द के स्थान पर अंकित_ हो

पृथक्त्व

ये पृथक्त्व भी हेमन्त में ही आना था कहाँ समझ पाया मन तर्पण का भात रांधते समय चित्त पितरों पर होना चाहिए हिय के पीड़ पर नहीं किन्तु मन था कि टभकता था चूल्हे पर रखे भात की ही तरह,, जो मन व्याकुल रहा पितर

Comments


© Copyright
bottom of page