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OUR POET's

  • vaidehivats109

विपन्नता

एक बिम्ब उतरता है आँखों में

साँझ का कोमल शीत लिए हुए

और मन अब भी थिरकने लगता

जल ,थल, लहरों के उतङ्ग शिखर पर,,

स्मृत है तुम्हें

नृत्यरत पात के उतावली थिरक सी

हमारे श्वांसों की मिश्रित अनुगूँज

ललाट पर सौ-सौ शशांक का उदित होना

चक्रांग से भी उज्ज्वल प्रेम के

उष्ण उर्मियों द्वारा छूने भर से,,

अब भी देखती हूँ उँगलियों के पोर को

और उभर आता है तुम्हारा नामाक्षर

जिसे लिख कर अलक्तक से

छुपा दी थी फूलों के मोहक इन्द्रजाल में ,,

स्मृतिलोक की परिधि से निकल

जहाँ पहुँचती हूँ मैं , वहाँ तुम नहीं

मिलता है तुमसे जुड़े स्मृतिसूत्र का एक सिरा,,

और दूसरा सिरा

लुप्त है निरंतर घूर्णन करते

तुम्हारे तलुओं के चक्र में

उसे पाना उतना ही दुष्कर है

जितना दुष्कर था शकुंतला के लिए

मीन मुख से मुँदरी का पाना,,

मेरे ऑंगन में उतर आया

फिर वही सांझ है ,

उदित हो रहा है पुरानी मुस्कान लिए

फिर वही पहला तारा

वही नीलिमा की चुनरी ओढ़े

श्वेतार्क का सर्वसिद्ध पौधा

फिर भी विपन्नता का मलीन चीवर

जैसे घेर रहा हो मुझे अपने बाहु पाश में,,

मेरी विपन्नता अब पिघला रही है

शालिग्राम बनी अहिल्या को

लौट भी आओ तुम

कर संकीर्ण प्रेम का वृत्तीय परिपथ,,

वैदेही वत्स✍️

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