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OUR POET's

  • vaidehivats109

|•शेष बस•|

रञ्जक के सम्मोहक इंद्रजाल में तुम्हारे नामाक्षर को छुपाती मैं

ढक रही थी हथेलियों को एक दूसरे से,,


मानो समेट रही अँजुरी में समुद्र बराबर शेष को

वही शेष जो जिया हमने स्वप्नों और कल्पनाओं में,,


आह कितनी रुग्ण मैं और कितना दिप्त प्रेम तुम्हारा

चाह कर भी बांध न सकी चक्षुओं के कोर में,,


वह कोई स्मृति खण्ड नहीं था

न ही वेदनाओं की गठरी थी

कि लाद लेती मैं आत्मा के पीठ पर,,


सामर्थ्यहीन मैं चुपचाप ही समाहित कर ली

अपनी प्रत्येक कोशिकाओं के जीवद्रव्य में,,


वह तरणी है, तारिणी है वैतरणी है

जिसे पार करना था मुझे

तुम्हारे अनामिका को पकड़कर,,


यह अन्तिम मोहाग्नि है मेरा, जो मेरे लिए है

कि मैं उस प्रेम की एकाधिकारिणी क्या

अंशमात्र भी नहीं थी,,


यदि कुछ थी भी तो कण्ठ के मध्य में अटकी-रुकी

एक अनुच्चारित नाम मात्र,,


©® सौम्या सिंह वैदेही


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