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OUR POET's

  • vaidehivats109

メ• अरण्य पथメ•


आदिम हो चले

दंडकारण्य के किसी पथ से

उसने अपने पथ को जोड़ा ,

सूने देवालय के नैऋत्य कोण से

अपनी दृष्टिरेख को,,


अभीप्साओं का इंद्रधनुष

ऊर्ध्व पर स्वतः कब आया है

जबकि पूर्णतः ही अपरिचित थी वो

परिसीमन के चक्रवात से

अपरिमितता के आघात से,,


हथेलियों पर बने मानचित्र में

आयु विराम को ढूंढती उसकी आँखों में

झलकने लगी थी रङ्गहीनता ,,


स्वप्न भी ऐसे उगे मानो

झील की अतल गहराई में जन्मी

नेत्रहीन मछलियाँ

और उगी

प्रेम पारितोषिक के रूप में मिली

शोक कविताएँ,,


कैसे जोहती हो

अपनी पीड़ाओं की कुल सम्पदा

यथेष्ठ स्थान पर प्रीत का रीत निभाते हुए

सम्बन्धों के प्रगाढ़ता को

और गाढ़ा बनाते हुए,,


तृष्णा वो तुम ही तो हो

जिसके मद में उथले ही सही

प्लवन होते रहा

देह का , प्राण का ,

चेत और अचेत का

किसी तट तो लगेगा

जहाँ सांझी होगी एकरूपता हमारी

आदि से आदि तक,,,


©® वैदेही वत्स

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