top of page

OUR POET's

  • vaidehivats109

हूक

रात्रि के तीसरे प्रहर

कूकती काकपाली का रुदन

क्षणांश में बिंध देती है

श्रवणेन्द्रिय को

उसी क्षणांश

उठता है हूक हृदय में

एक अन्तिम बार

तुम्हारे मुख से

अपना नाम तक न सुनने पाई !


विदा के क्षणों में

तोड़ना होता है मोह ,

उतारने होते हैं ऋण

और बन जाना होता है

स्मृति मात्र

किन्तु ये स्मृति बनने की

प्रक्रिया दुष्कर है

जाने से भी अधिक ,

अत्यधिक !


अश्रुओं के अन्तिम बूँद के बाद

नेत्रों से गिरा नमक

कर रहा अब

आत्मा का क्षरण

अहा !!

कितनी मुखरित है

ये शुचिशयन

और मैं शव मात्र !


वैदेही वत्स ✍️

2 views

Recent Posts

See All

कल्पनाओं का अवसान

दर्शनों पर शोध करने वाला ये मन शब्दों में नहीं बांध सका कभी निकट आते तुम्हारे देह-गन्ध और स्पर्श की शीतल अनुभूति को,, गङ्गा जल को छूकर भी नहीं बता सकती तुम्हारे शब्दों की आद्रता न ही इंद्रधनुष में कोई

प्रतिबिम्ब

प्रेम की प्रथम अनुभूति हो तुम तुम्हारी प्रतीक्षा भी इतनी मधुर मानो चरणामृत हो स्वयं प्रेम का,, चिर दर्शनाभिलाषी मन क्षण-क्षण इतना उच्चारित करता रहा तुम्हारा नाम कि अब प्रेम शब्द के स्थान पर अंकित_ हो

पृथक्त्व

ये पृथक्त्व भी हेमन्त में ही आना था कहाँ समझ पाया मन तर्पण का भात रांधते समय चित्त पितरों पर होना चाहिए हिय के पीड़ पर नहीं किन्तु मन था कि टभकता था चूल्हे पर रखे भात की ही तरह,, जो मन व्याकुल रहा पितर

Comments


© Copyright
bottom of page