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  • Writer's pictureVaidehi Vats

◆छल◆

Updated: May 30, 2023

◆छल◆


अँजुरी भर कर पुष्प बाँटते-बाँटते

न जाने कब बाँट बैठा वो

हृदय में संचित छल

कुछ

आभास ही नहीं हुआ ..


प्रेम कब तिरोहित हुआ

संकोचवश

न वो बोल सका..

न मैं पूछ सकी

प्रयासरत रहे हमारे नेत्र

दुबारा

फिर कभी न मिल सके

कविताएं अब

छल का आवरण बन चुकी थीं ...


छल के प्रकट होने पर

आक्षेप ही

एकमात्र अस्त्र है

जिससे प्रेम को

स्तब्ध

किया जा सकता है...


स्तब्धता के आघात से तप्त हृदय

मूकता के अतिरिक्त

द्वारबन्ध ही "अंतिम उपहार" था

जो तुमसे माँग बैठा ...


रात्रि की कई प्रहर

भीगती रही नम हिचकियों से

अमलताश निहारता रहा

नए पूनम के चाँद को

शिउली सिहर कर

उतर गई भूमि पर

समय पूर्व ही ...


आह !!!

प्रेम सिर्फ विछोह से नहीं

मर जाता है छल से भी

जो किया जाता है

प्रेम के नाम पर ...


©®सौम्या सिंह~वैदेही




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