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OUR POET's

  • vaidehivats109

Untitled

|| शुभेक्षिणी ||

गहनता और गहन हो जाती है

तुम्हारे पुकार की प्रतीक्षा में

और मैं जलती हूँ व्योमदीप की तरह

निशा के आरम्भ से अगले आरम्भ तक,,


अन्धकार की प्रतिछाया में

लिखी मैं हवा के हर तरङ्ग पर

पुकार की नित नई परिभाषाएँ

कोई तो छुए तुम्हारे भीत को

और रोप दे उस पर

प्रेम का पौध , टहनी या बीज,,


अब यदि मौन हमारी नियती है तो

लिखना तुम अन्तिम कविताएं

चाँद को अश्रुओं में घोलकर

मेरी पुतलियों , पिंडलियों और नेत्रपट पर,,


कि जब चीरना हो चित का अन्धकार तो

स्मृतियों से निकालना होता है विरह दंश

चाँद के देह से मिटाने को दाग

टूटना ही पड़ता है किसी तारे को

कदाचित मौलती है मौलश्री

दो हथेलियों के तीव्रतम रगड़ से,,


नेत्रों में भर मौलश्री का सुगन्ध

तुम हटाना मेरे केश पार्श्व ग्रीवा से

और उढ़ेल देना चुम्बनों से

मेरे धमनियों में ओस की निर्मलता,,


कि मैं फिर से उग आऊँ भूमि पर

बनकर पुनर्नवा दूर्वा

जिसे कभी तुम

कर सको अर्पित मनवांछित के लिए विघ्नहर्ता को

कभी रौंद दो पैरों के नीचे तुच्छ तृण समझकर....


©® वैदेही वत्स

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