top of page

The Review 

कल्पनाओं का अवसान

दर्शनों पर शोध करने वाला ये मन शब्दों में नहीं बांध सका कभी निकट आते तुम्हारे देह-गन्ध और स्पर्श की शीतल अनुभूति को,, गङ्गा जल को छूकर भी...

प्रतिबिम्ब

प्रेम की प्रथम अनुभूति हो तुम तुम्हारी प्रतीक्षा भी इतनी मधुर मानो चरणामृत हो स्वयं प्रेम का,, चिर दर्शनाभिलाषी मन क्षण-क्षण इतना...

पृथक्त्व

ये पृथक्त्व भी हेमन्त में ही आना था कहाँ समझ पाया मन तर्पण का भात रांधते समय चित्त पितरों पर होना चाहिए हिय के पीड़ पर नहीं किन्तु मन था...

||•तदन्तर•||

प्रेम की टहनियों से झर चुके थे पारिजात और वहाँ उग आईं पीड़ाएँ अपेक्षा और उपेक्षा के दंश को लिए हुए रिक्तियां जानती थी कि उन्हें छुपाया जा...

•••द्युति

एक दूसरे में निमग्न हम भूल गए कि परस्पर पकड़े दो हाथों के बीच मिलने वाली हस्तरेखाएँ बनने लगती हैं स्वेद की नदियाँ और पकड़ स्वतः ही ढीली...

||दीप्तता का श्राप||

उजास के निरन्तरता से दग्ध हुए नेत्र विश्राम पाने की चेष्टा में हथेलियों से ओट माँगती प्रतीक्षित रही सदियों से,, किन्तु कोई छवि न उभरी...

विपन्नता

एक बिम्ब उतरता है आँखों में साँझ का कोमल शीत लिए हुए और मन अब भी थिरकने लगता जल ,थल, लहरों के उतङ्ग शिखर पर,, स्मृत है तुम्हें नृत्यरत...

अबूझ/***

अबूझ/*** मेघपुष्प बरसने के बाद भी भिस्ती अभी प्यासा ही है भीग कर भी विकल है अन्तस्थ के ताप से,, क्या किसी ने देखा है किसी नदी को प्यास से...

उपमाओं का छल

प्रतीक्षा एवं मौन की एक लम्बी नदी के साथ-साथ बहते हुए आभास हुआ त्याग समर्पण आदि सैद्धांतिक भाव मन को छलने के साधन मात्र हैं,, अश्रुओं एवं...

प्राण प्रतिष्ठा

तुम्हारे प्रेम के माधुर्य में आकण्ठ डूबा मन अपरिचित था विछोह की परिकल्पना से भी शुक्रतारा के टूटने पर आभास हुआ प्रेम में पीड़ा का समायोजन...

メ• अरण्य पथメ•

आदिम हो चले दंडकारण्य के किसी पथ से उसने अपने पथ को जोड़ा , सूने देवालय के नैऋत्य कोण से अपनी दृष्टिरेख को,, अभीप्साओं का इंद्रधनुष ऊर्ध्व...

हूक

1
2
© Copyright
bottom of page